Friday, February 22, 2013
Voice against illegal-demolition and eviction
Fri, Feb 22, 2013 at 9:09 AM
A Protest Demonstration on 4th March
Dear Friends !
Greetings !
We are sending you our appeal for your solidarity and support on behalf of National Movement For Land, Labor & Justice- NMLLJ and Forum against EWS Land Grab, Bangalore Karnataka.
Hope you are already aware of the illegal-demolition and eviction of 1200 families from a slum in Bangalore, where they were living for more than 20 years .
This brutal action was enacted by the combined violence of police, pvt goons, and government officials.The whole purpose is to grab the 15.64 acres of prime land on which they were living. it is between Jan 18--20. but even today the evicted people are living on footpath. this is the first where a `corporate land sharing project ` under PPP is being introduced in entire south India, in Urban poor Housing. If this move is not resisted , it only pave way to more and more land grab from slum people all over. What we are experiencing in the country is the diminishing Democracy and flourishing Corporatocracy.
At this Juncture we request all democratic organization at Delhi to extend support and solidarity in resisting, exposing and get back the land grabbed from the social groups -historically marginalized.
.We seek your support and solidarity in organizing a protest Demonstration on 4th March at Jantar Mantar, New Delhi and a CSO consultation on 6th at Delhi. A strong struggle group from Forum against EWS Land Grab, Bangalore Karnataka.
We request you to play a prominent / leading role in actualizing organized mass protest at Delhi on 4th march. Around 20 people from Bangalore forum that led the struggle so far, will be joining the protest.
Please see these attachments & Photos for more details.
M.R.Prabhakar
Convener, Forum against EWS Land Grab, Bangalore
09449820566.
ARUN KHOTE
राष्ट्रीय भूमि, श्रम एवं न्याय आन्दोलन
National Movement For Land, Labor & Justice-NMLLJ
222,Vidhayak Niwas, Aishbagh Road, Rajendra Nagar
Lucknow -226004 Utter Pradesh (INDIA)
Mob: 91#9451872099
At Jantar Mantar, New Delhi
Monday, October 8, 2012
Friday, October 5, 2012
कर्नाटक में राष्ट्रीय राजमार्ग-63
05-अक्टूबर-2012 12:25 IST
हुबली-होसपेट खंड को चार लेन का बनाने की मंजूरी
आधारभूत संरचना की मंत्रिमंडलीय समिति ने डिजाइन, निर्माण, वित्त, परिचालन और हस्तांतरण (डीबीएफओटी/बीओटी) आधार पर एनएचडीपी चरण-4 के अंतर्गत कर्नाटक में राष्ट्रीय राजमार्ग-63 के हुबली-होसपेट खंड को चार लेन का बनाने की मंजूरी दे दी है। इस सड़क की कुल लंबाई 143.29 किलोमीटर होगी। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पूर्व-निर्माण गतिविधियों सहित परियोजना की कुल लागत 1442.48 करोड़ रूपये होगी। 30 महीने की निर्माण अवधि सहित इस सड़क की रियायती अवधि 27 वर्ष होगी।
परियोजना का मुख्य उद्देश्य कर्नाटक में आधारभूत संरचना सुधार में तेजी लाने के साथ-साथ हुबली और होसपेट के बीच चलने वाले भारी यातायात के समय और यात्रा की लागत में कमी लाना भी है। यह खंड मुख्य औद्योगिक शहरों होसपेट और हुबली को आपस में जोड़ता है। बेल्लारी, कर्नाटक का प्रमुख खनन शहर है और यह खंड बेल्लारी से कारवाड़ बंदरगाह तक खनिजों की ढुलाई में मदद करेगा। परियोजना गतिविधियों के लिए इससे स्थानीय मजदूरों को अधिक रोजगार उपलब्ध होंगे तथा धारवाड़, गड़ाग और कोपाल जिले भी लाभांवित होंगे। (पत्र सूचना कार्यालय)
मीणा/इन्द्रपाल/गीता-4789
हुबली-होसपेट खंड को चार लेन का बनाने की मंजूरी
आधारभूत संरचना की मंत्रिमंडलीय समिति ने डिजाइन, निर्माण, वित्त, परिचालन और हस्तांतरण (डीबीएफओटी/बीओटी) आधार पर एनएचडीपी चरण-4 के अंतर्गत कर्नाटक में राष्ट्रीय राजमार्ग-63 के हुबली-होसपेट खंड को चार लेन का बनाने की मंजूरी दे दी है। इस सड़क की कुल लंबाई 143.29 किलोमीटर होगी। भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पूर्व-निर्माण गतिविधियों सहित परियोजना की कुल लागत 1442.48 करोड़ रूपये होगी। 30 महीने की निर्माण अवधि सहित इस सड़क की रियायती अवधि 27 वर्ष होगी।
परियोजना का मुख्य उद्देश्य कर्नाटक में आधारभूत संरचना सुधार में तेजी लाने के साथ-साथ हुबली और होसपेट के बीच चलने वाले भारी यातायात के समय और यात्रा की लागत में कमी लाना भी है। यह खंड मुख्य औद्योगिक शहरों होसपेट और हुबली को आपस में जोड़ता है। बेल्लारी, कर्नाटक का प्रमुख खनन शहर है और यह खंड बेल्लारी से कारवाड़ बंदरगाह तक खनिजों की ढुलाई में मदद करेगा। परियोजना गतिविधियों के लिए इससे स्थानीय मजदूरों को अधिक रोजगार उपलब्ध होंगे तथा धारवाड़, गड़ाग और कोपाल जिले भी लाभांवित होंगे। (पत्र सूचना कार्यालय)
मीणा/इन्द्रपाल/गीता-4789
Monday, September 17, 2012
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को मिली सफलता
आंखों की पुतली का सत्यापन अध्ययन सफल
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने कर्नाटक के मैसूर जिले में आंखों की पुतली के सत्यापन प्रमाण का अध्ययन सफलतापूर्वक संचालित किया है। अध्ययन से आंखों की पुतली के सत्यापन में उच्च स्तर की सटीकता (99 दशमलव 2 प्रतिशत) प्राप्त हुई है। आंखों की पुतली और उंगलियों के निशान की पहचान की सहायता से सार्वभौमिक समावेशन के लक्ष्य को पाया जा सकता है तथा आधार परियोजना के सत्यापन के अनुसार ही इसके सफलतापूर्वक इस्तेमाल पर आगे बढ़ा जा सकता है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की सफलता की तर्ज पर ही तथा किसी सेवा को आरंभ करने से पहले संकल्पना के सत्यापन के साबित हो चुके प्रचलन के अनुसार आंखों की पुतली के ऑन लाइन सत्यापन प्रणाली की विशेषता का अध्ययन किया गया। यह अध्ययन 27 मई, 2012 से 30 जुलाई, 2012 के बीच कर्नाटक के मैसूर जिले के नांजनगुड तालुक में किया गया जो उपनगरीय क्षेत्र है। इसके तहत वहां के 5,833 निवासियों के 2,15,342 पुतली सत्यापन व्यवहार का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में छह विभिन्न ओईएम के माध्यम से आईरिस कैमरे के आठ मॉडल इस्तेमाल किये गये। इस अध्ययन से भी बॉयोमिट्रिक इको सिस्टम में विशेष सुधार के क्षेत्र का पता लगा, जिससे कि इसकी सटीकता और बढ़ाई जा सके। इस विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट को प्रलेखित किया गया, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की वेब-साइट पर प्रकाशित किया जा रहा है, इसके बाद एक कार्यशाला आयोजित की जायेगी जिसमें कलन-विधि तथा युक्ति में सुधार के लिए विशेष कार्यप्रणाली के लिए निर्देशित किया जायेगा। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण इसके बाद आगे और विशेष अध्ययन करेगा। इन अध्ययनों से सत्यापन तथा इन्हें स्थापित किये जाने के उद्देश्य के लिए आईरिस उपकरण का निरूपण हो सकेगा। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बॉयोमिट्रिक इकोसिस्टम की प्रतिपुष्टि के परिणाम स्वरूप उंगलियों के निशान के सत्यापन संबंधी प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ। अब आंखो की पुतली संबंधी सत्यापन में भी इसी तरह का परिणाम अपेक्षित है। यह इस बात को इंगित करता है कि आंखों की पुतली से सत्यापन की गुंजाईश 99 दशमलव 5 प्रतिशत से अधिक की सटीकता प्रदान करने की है। (पत्र सूचना कार्यालय) 17-सितम्बर-2012 17:53 IST
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भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण ने कर्नाटक के मैसूर जिले में आंखों की पुतली के सत्यापन प्रमाण का अध्ययन सफलतापूर्वक संचालित किया है। अध्ययन से आंखों की पुतली के सत्यापन में उच्च स्तर की सटीकता (99 दशमलव 2 प्रतिशत) प्राप्त हुई है। आंखों की पुतली और उंगलियों के निशान की पहचान की सहायता से सार्वभौमिक समावेशन के लक्ष्य को पाया जा सकता है तथा आधार परियोजना के सत्यापन के अनुसार ही इसके सफलतापूर्वक इस्तेमाल पर आगे बढ़ा जा सकता है। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की सफलता की तर्ज पर ही तथा किसी सेवा को आरंभ करने से पहले संकल्पना के सत्यापन के साबित हो चुके प्रचलन के अनुसार आंखों की पुतली के ऑन लाइन सत्यापन प्रणाली की विशेषता का अध्ययन किया गया। यह अध्ययन 27 मई, 2012 से 30 जुलाई, 2012 के बीच कर्नाटक के मैसूर जिले के नांजनगुड तालुक में किया गया जो उपनगरीय क्षेत्र है। इसके तहत वहां के 5,833 निवासियों के 2,15,342 पुतली सत्यापन व्यवहार का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में छह विभिन्न ओईएम के माध्यम से आईरिस कैमरे के आठ मॉडल इस्तेमाल किये गये। इस अध्ययन से भी बॉयोमिट्रिक इको सिस्टम में विशेष सुधार के क्षेत्र का पता लगा, जिससे कि इसकी सटीकता और बढ़ाई जा सके। इस विस्तृत अध्ययन रिपोर्ट को प्रलेखित किया गया, जिसे भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की वेब-साइट पर प्रकाशित किया जा रहा है, इसके बाद एक कार्यशाला आयोजित की जायेगी जिसमें कलन-विधि तथा युक्ति में सुधार के लिए विशेष कार्यप्रणाली के लिए निर्देशित किया जायेगा। भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण इसके बाद आगे और विशेष अध्ययन करेगा। इन अध्ययनों से सत्यापन तथा इन्हें स्थापित किये जाने के उद्देश्य के लिए आईरिस उपकरण का निरूपण हो सकेगा। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बॉयोमिट्रिक इकोसिस्टम की प्रतिपुष्टि के परिणाम स्वरूप उंगलियों के निशान के सत्यापन संबंधी प्रदर्शन में उल्लेखनीय सुधार हुआ। अब आंखो की पुतली संबंधी सत्यापन में भी इसी तरह का परिणाम अपेक्षित है। यह इस बात को इंगित करता है कि आंखों की पुतली से सत्यापन की गुंजाईश 99 दशमलव 5 प्रतिशत से अधिक की सटीकता प्रदान करने की है। (पत्र सूचना कार्यालय) 17-सितम्बर-2012 17:53 IST
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Iris authentication study in Mysore
UIDAI’s proof of concept study successful
The UIDAI has successfully conducted the proof of concept Iris authentication study in Mysore district of Karnataka. The study brought out the high accuracy levels (above 99.2%) achieved by iris authentication. A combination of iris and fingerprint authentication can further the goals of universal inclusion and pave the way for successful applications based on Aadhaar authentication. In line with UIDAI’s successful and proven practice of conducting Proof of Concept (PoC) studies before launching any service, a PoC has been conducted to characterize & identify optimal authentication setups for online iris authentication. The PoC was conducted in semi urban setting in Nanjangud taluk in Mysore district of Karnataka between May 27th and July 30th 2012. 215,342 iris authentication transactions from 5833 residents were studied in this PoC. Eight models of iris cameras through six different OEMs participated in this study. This study has also brought out the specific improvement areas that biometric ecosystem needs to work upon to further improve the accuracy and coverage percentage. The detailed findings are documented in a report which is being published on UIDAI’s website. This will be followed by a workshop with the device vendors to guide them on the specific actions to be taken by them to improve algorithms and devices. UIDAI will then take up further field studies. These studies would also lead to formulation of iris device specifications for certification and deployment purposes. It may also be noted that as a result of feedback to the biometric ecosystem, the performance of fingerprint authentication improved substantially from the time UIDAI conducted its first fingerprint authentication PoC to the last PoC. Same is expected in iris authentication domain too, which points that iris authentication has a scope of providing accuracy levels above 99.5%. (PIB) 17-September-2012 15:8 IST
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The UIDAI has successfully conducted the proof of concept Iris authentication study in Mysore district of Karnataka. The study brought out the high accuracy levels (above 99.2%) achieved by iris authentication. A combination of iris and fingerprint authentication can further the goals of universal inclusion and pave the way for successful applications based on Aadhaar authentication. In line with UIDAI’s successful and proven practice of conducting Proof of Concept (PoC) studies before launching any service, a PoC has been conducted to characterize & identify optimal authentication setups for online iris authentication. The PoC was conducted in semi urban setting in Nanjangud taluk in Mysore district of Karnataka between May 27th and July 30th 2012. 215,342 iris authentication transactions from 5833 residents were studied in this PoC. Eight models of iris cameras through six different OEMs participated in this study. This study has also brought out the specific improvement areas that biometric ecosystem needs to work upon to further improve the accuracy and coverage percentage. The detailed findings are documented in a report which is being published on UIDAI’s website. This will be followed by a workshop with the device vendors to guide them on the specific actions to be taken by them to improve algorithms and devices. UIDAI will then take up further field studies. These studies would also lead to formulation of iris device specifications for certification and deployment purposes. It may also be noted that as a result of feedback to the biometric ecosystem, the performance of fingerprint authentication improved substantially from the time UIDAI conducted its first fingerprint authentication PoC to the last PoC. Same is expected in iris authentication domain too, which points that iris authentication has a scope of providing accuracy levels above 99.5%. (PIB) 17-September-2012 15:8 IST
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Thursday, August 23, 2012
देश की एकता-अखंडता खतरे में ?//राजीव गुप्ता
भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी से सबक क्यों नहीं?
भारत इस समय किसी बड़ी संभावित
साम्प्रदायिक-घटना रूपी ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़ा हुआ प्रतीत हो रहा है.
देश की एकता-अखंडता खतरे में पड़ती हुई नजर आ रही है. देश की संसद में भी
आतंरिक सुरक्षा को लेकर तथा सरकार की विश्वसनीयता और उसकी कार्यप्रणाली पर
प्रश्नचिंह खड़े किये जा रहे है. सांसदों की चीख-पुकार से सरकार की अब जाकर
नीद खुली है. सरकार ने आनन्-फानन में देश में मचे अब तक के तांडव को
पाकिस्तान की करतूत बताकर अपना पल्ला झड़ने की कोशिश करते हुए दोषियों के
खिलाफ कार्यवाही करने के नाम पर भारत के गृहमंत्री ने पाकिस्तान के
गृहमंत्री से रविवार को बात कर एक रस्म अदायगी मात्र कर दी और प्रति उत्तर
में पाकिस्तान ने अपना पल्ला झाड़ते हुए भारत को आरोप-प्रत्यारोप का खेल
खेलना बंद करने की नसीहत देते हुए यहाँ तक कह दिया कि भारत के लिए सही यह
होगा कि वह अपने आंतरिक मुद्दों पर पर ध्यान दे और उन पर काबू पाने की
कोशिश करे. अब सरकार लाख तर्क दे ले कि इन घटनाओ के पीछे पाकिस्तान का हाथ
है, परन्तु सरकार द्वारा समय पर त्वरित कार्यवाही न करने के कारण जनता उनके
इन तर्कों से संतुष्ट नहीं हो रही है इसलिए अब प्रश्न चिन्ह सरकार की नियत
पर खड़ा हो गया है क्योंकि असम में 20 जुलाईं से शुरू हुईं सांप्रादायिक
हिंसा जिसमे समय रहते तरुण गोगोईं सरकार ने कोई बचाव-कदम नहीं उठाए मात्र
अपनी राजनैतिक नफ़ा-नुक्सान के हिसाब - किताब में ही लगी रही. परिणामतः वहां
भयंकर नर-संहार हुआ और वहा के लाखो स्थानीय निवासियों ने अपना घर-बार
छोड़कर राहत शिवरों में रहने के लिए मजबूर हो गए.
असम के विषय में यह बात जग-जाहिर है कि असम और बंग्लादेश के मध्य की 270 किलोमीटर लम्बी सीमा में से लगभग 50 किलोमीटर तक की सीमा बिलकुल खुली है जहा से अवैध घुसपैठ होती है और इन्ही अवैध घुसपैठों के चलते लम्बे समय से वहा की स्थानीय जनसंख्या का अनुपात लगातार नीचे गिरता जा रहा है. यह भी सर्वविदित है कि असम में हुई हिंसा हिन्दू बनाम मुस्लिम न होकर भारतीय बनाम बंग्लादेशी घुसपैठ का है. जिसकी आवाज़ कुछ दिन पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी बुलंद की थी और यह सरकार से मांग की थी कि असम से पलायन कर गए लोगों की स्थिति कश्मीरी पंडितों जैसी नहीं होनी चाहिए . ध्यान देने योग्य है कि 1985 में तत्कालीन प्राधानमंत्री राजीव गांधी के समय असम में यह समझौता हुआ था कि बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाय परन्तु इस विषय के राजनीतिकरण के चलते दुर्भाग्य से इस समझौते के प्रावधानों को कभी भी गम्भीरता से लागू नहीं किया गया. परिणामतः असम में 20 जुलाईं से उठी चिंगारी ने आज पूरे देश को अपनी चपेट में लिया है.
दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के साथ-साथ महाराष्ट्र से उत्तर-पूर्व के हजारो छात्रों का वहा से पलायन हो रहा है और अब यह सिलसिला भारत के दूसरो शहरो में भी शुरू हो जायेगा इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. प्रधानमंत्री संसद में यह लाख तर्क देते रहे कि हर देशवासी की तरह पूर्वोत्तर के लोगों को देश के किसी भी भाग में रहने, पढ़ाईं करने और जीविकोपार्जन करने का अधिकार है. पर सच्चाई उनके इस तर्क से अब कोसों दूर हो चुकी है. देश की जनता को उनके तर्क पर अब विश्वास नहीं हो रहा है. सरकार के सामने अब मूल समस्या यही है कि वो जनता को विश्वास कैसे दिलाये. भारतवर्ष सदियों से अपने को विभिन्नता में एकता वाला देश मानता आया है क्योंकि यहाँ सदियों से अनेक मत-पन्थो के अनुयायी रहते आये है. परन्तु समस्या विकराल रूप तब धारण कर लेती है जब एक विशेष समुदाय के लोग देश की शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में अपना विश्वास करना छोड़ कर भारत की एकता - अखंडता पर प्रहार करने लग जाते है और वहा के दूसरे समुदाय की धार्मिक तथा राष्ट्रभक्ति की भावनाओ को कुचलने का प्रयास करने लग जाते है क्योंकि हर साम्प्रदायिक-घटना किसी समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय की भावनाओ के आहत करने से ही उपजती है. अभी हाल में ही दिल्ली के सुभाष पार्क , मुम्बई के आज़ाद मैदान, कोसीकला, बरेली जैसे शहरो में हुई घटनाये इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.
मुम्बई में बने शहीदों के स्मारकों को तोडा गया, मीडिया की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया. पुलिस पर हमला किया गया जिसमे गंभीर रूप से घायल हो गए. इतना ही नहीं यह आग रांची, बैंगलोर जैसे अनेक शहरों तक जा पहुची यहाँ तक की उत्तर प्रदेश के लखनऊ, इलाहाबाद जैसे कई शहर भी इस आग में झुलस गए परिणामतः प्रशासन द्वारा वहा कर्फ्यू लगा दिया गया. असल में अब समस्या यह है नहीं किस राज्य में किस समुदाय द्वारा सांप्रदायिक - हिंसा की जा रही है अथवा उन्हें ऐसा करने के लिए कौन उकसा रहा है जिससे उन्हें ऐसा करने का बढ़ावा मिल रहा है अपितु अब देश के सम्मुख विचारणीय प्रश्न यह है कि इतिहास अपने को दोहराना चाह रहा है क्या ? सरकार भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी वाले इतिहास से सबक क्यों नहीं ले रही है ? क्या सरकार खिलाफत-आन्दोलन और अलास्का की घटना की प्रतिक्रिया स्वरुप भारत में हुई साम्प्रदयिक-घटना जैसी किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रही है ? यह बात सरकार को ध्यान रखनी चाहिए कि जो देश अपने इतिहास से सबक नहीं लिया करता उसका भूगोल बदल जाया करता है इस बात का प्रमाण भारत का इतिहास है. एक समुदाय द्वारा देश में मचाये जा रहे उत्पात पर निष्पक्ष कही जाने वाली मीडिया की अनदेखी और सरकार की चुप्पी से भारत के बहुसंख्यको में अभी काफी मौन-रोष पनप रहा है इस बात का सरकार और मीडिया को ध्यान रखना चाहिए और समय रहते इस समस्या को नियंत्रण में करने हेतु त्वरित कार्यवाही करना चाहिए.
यह एक कटु सत्य है कि विभिन्न समुदायों के बीच
शांति एवं सौहार्द स्थापित करने की राह में सांप्रदायिक दंगे एक बहुत बड़ा
रोड़ा बन कर उभरते है और साथ ही मानवता पर ऐसा गहरा घाव छोड़ जाते है जिससे
उबरने में मानव को कई - कई वर्ष तक लग जाते है. ऐसे में समुदायों के बीच
उत्पन्न तनावग्रस्त स्थिति में किसी भी देश की प्रगति कदापि संभव नहीं है.
आम - जन को भी देश की एकता – अखंडता और पारस्परिक सौहार्द बनाये रखने के
लिए ऐसी सभी देशद्रोही ताकतों को बढ़ावा न देकर अपनी सहनशीलता और धैर्य का
परिचय देश के विकास में अपना सहयोग करना चाहिए. आज समुदायों के बीच गलत
विभाजन रेखा विकसित की जा रही है. विदेशी ताकतों की रूचि के कारण स्थिति
और बिगड़ती जा रही है जो भारत की एकता को बनाये रखने में बाधक है. अतः अब
समय आ गया है देश भविष्य में ऐसी सांप्रदायिक घटनाये न घटे इसके लिए जनता
स्वयं प्रतिबद्ध हो.
- लेखक:राजीव गुप्ता, 9811558925
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दिल्ली स्क्रीन में देखें: एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास
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| तस्वीर जनोक्ति से साभार |
असम के विषय में यह बात जग-जाहिर है कि असम और बंग्लादेश के मध्य की 270 किलोमीटर लम्बी सीमा में से लगभग 50 किलोमीटर तक की सीमा बिलकुल खुली है जहा से अवैध घुसपैठ होती है और इन्ही अवैध घुसपैठों के चलते लम्बे समय से वहा की स्थानीय जनसंख्या का अनुपात लगातार नीचे गिरता जा रहा है. यह भी सर्वविदित है कि असम में हुई हिंसा हिन्दू बनाम मुस्लिम न होकर भारतीय बनाम बंग्लादेशी घुसपैठ का है. जिसकी आवाज़ कुछ दिन पहले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने भी बुलंद की थी और यह सरकार से मांग की थी कि असम से पलायन कर गए लोगों की स्थिति कश्मीरी पंडितों जैसी नहीं होनी चाहिए . ध्यान देने योग्य है कि 1985 में तत्कालीन प्राधानमंत्री राजीव गांधी के समय असम में यह समझौता हुआ था कि बंगलादेशी घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजा जाय परन्तु इस विषय के राजनीतिकरण के चलते दुर्भाग्य से इस समझौते के प्रावधानों को कभी भी गम्भीरता से लागू नहीं किया गया. परिणामतः असम में 20 जुलाईं से उठी चिंगारी ने आज पूरे देश को अपनी चपेट में लिया है.
दक्षिण भारत के दो प्रमुख राज्यों आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के साथ-साथ महाराष्ट्र से उत्तर-पूर्व के हजारो छात्रों का वहा से पलायन हो रहा है और अब यह सिलसिला भारत के दूसरो शहरो में भी शुरू हो जायेगा इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है. प्रधानमंत्री संसद में यह लाख तर्क देते रहे कि हर देशवासी की तरह पूर्वोत्तर के लोगों को देश के किसी भी भाग में रहने, पढ़ाईं करने और जीविकोपार्जन करने का अधिकार है. पर सच्चाई उनके इस तर्क से अब कोसों दूर हो चुकी है. देश की जनता को उनके तर्क पर अब विश्वास नहीं हो रहा है. सरकार के सामने अब मूल समस्या यही है कि वो जनता को विश्वास कैसे दिलाये. भारतवर्ष सदियों से अपने को विभिन्नता में एकता वाला देश मानता आया है क्योंकि यहाँ सदियों से अनेक मत-पन्थो के अनुयायी रहते आये है. परन्तु समस्या विकराल रूप तब धारण कर लेती है जब एक विशेष समुदाय के लोग देश की शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में अपना विश्वास करना छोड़ कर भारत की एकता - अखंडता पर प्रहार करने लग जाते है और वहा के दूसरे समुदाय की धार्मिक तथा राष्ट्रभक्ति की भावनाओ को कुचलने का प्रयास करने लग जाते है क्योंकि हर साम्प्रदायिक-घटना किसी समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय की भावनाओ के आहत करने से ही उपजती है. अभी हाल में ही दिल्ली के सुभाष पार्क , मुम्बई के आज़ाद मैदान, कोसीकला, बरेली जैसे शहरो में हुई घटनाये इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है.
मुम्बई में बने शहीदों के स्मारकों को तोडा गया, मीडिया की गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया. पुलिस पर हमला किया गया जिसमे गंभीर रूप से घायल हो गए. इतना ही नहीं यह आग रांची, बैंगलोर जैसे अनेक शहरों तक जा पहुची यहाँ तक की उत्तर प्रदेश के लखनऊ, इलाहाबाद जैसे कई शहर भी इस आग में झुलस गए परिणामतः प्रशासन द्वारा वहा कर्फ्यू लगा दिया गया. असल में अब समस्या यह है नहीं किस राज्य में किस समुदाय द्वारा सांप्रदायिक - हिंसा की जा रही है अथवा उन्हें ऐसा करने के लिए कौन उकसा रहा है जिससे उन्हें ऐसा करने का बढ़ावा मिल रहा है अपितु अब देश के सम्मुख विचारणीय प्रश्न यह है कि इतिहास अपने को दोहराना चाह रहा है क्या ? सरकार भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी वाले इतिहास से सबक क्यों नहीं ले रही है ? क्या सरकार खिलाफत-आन्दोलन और अलास्का की घटना की प्रतिक्रिया स्वरुप भारत में हुई साम्प्रदयिक-घटना जैसी किसी बड़ी घटना का इंतज़ार कर रही है ? यह बात सरकार को ध्यान रखनी चाहिए कि जो देश अपने इतिहास से सबक नहीं लिया करता उसका भूगोल बदल जाया करता है इस बात का प्रमाण भारत का इतिहास है. एक समुदाय द्वारा देश में मचाये जा रहे उत्पात पर निष्पक्ष कही जाने वाली मीडिया की अनदेखी और सरकार की चुप्पी से भारत के बहुसंख्यको में अभी काफी मौन-रोष पनप रहा है इस बात का सरकार और मीडिया को ध्यान रखना चाहिए और समय रहते इस समस्या को नियंत्रण में करने हेतु त्वरित कार्यवाही करना चाहिए.
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| लेखक:राजीव गुप्ता |
- लेखक:राजीव गुप्ता, 9811558925
इसी कलम से:
देश की एकता-अखंडता खतरे में ?//राजीव गुप्ता
भारत-विभाजन जैसी वीभत्स त्रासदी से सबक क्यों नहीं?पंजाब स्क्रीन में भी देखें
दिल्ली स्क्रीन में देखें: एक ही जन्म में दो जन्म का कारावास
देश की एकता-अखंडता खतरे में ?//राजीव गुप्ता
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